ऋग्वेद
का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्य वेद।
स्थापत्य वेद जो
अथर्ववेद का उपवेद हैं, कालान्तर में यह स्थापत्यवेद ही वास्तुशास्त्र के रूप में
विकसित हुआ। स्थापत्य वेद का उद्गम संस्कृत के ‘स्थापना’ शब्द से है, जिसका अर्थ स्थापना
करना है एवं वेद का तात्पर्य ज्ञान से है।
स्थापत्य वेद ऐसा ज्ञान है की व्यक्ति स्वयं को कैसे स्थापित करे जिससे व्यक्ति
दैनिक जीवन में सदैव प्राकृतिक विधानों के ऊर्ध्वगामी सिद्धांतों के अनुरूप जीवन
रखे।स्थापत्य वेद एक मात्रा विज्ञान है जिसके
पास स्थल चयन, उचित दिशा, विन्यास, स्थापन एवं कमरों
का उनके प्रयोजन के अनुसार नियोजन का सटीक ज्ञान एवं दीर्घकालीन परीक्षित सिद्धांत
है ।
इस प्रकार स्थापत्य वेद में प्राकृतिक विधानों के अनुरूप घरों एवं
कार्यालयों के अभिकल्पन के लिए उचित गणितीय फार्मूला, समीकरणों एवं
समानुपातों का वर्णन किया है। जिससे प्रकृति के सर्वाधिक मूलभूत नियमों का लाभ उठाया
जा सके और व्यक्ति पूर्ण स्वास्थ्य, प्रसन्नता, एवं समृद्धि को
प्राप्त करे।
जीवन में अनेक समस्याओं को हल करने लिए मानव बाकी उपायों के साथ साथ ज्योतिष व
तंत्र का सहारा भी लेता है। ज्योतिष व तंत्र में वनस्पति का भी बहुत महत्व है जैसे
कि हल्दी, रूद्राक्ष, कमलगट्टा इत्यादि। अत: इसे तंत्र में एक नवीन
शाखा ‘‘वनस्पति तंत्र’’के रूप में भी जाना जाता है। प्रकृति से
प्राप्त ये वस्तुऐं अपनी सकारात्मक ऊर्जा द्वारा मनुष्य के जीवन में भी सकारात्मक
वातावरण बनाती है जिसका उपयोग इस वनस्पति तंत्र के अन्तर्गत किया जाता है।
निम्रांकित लेख कुछ सुलभ वनस्पति अर्थात पेड पौधों से प्राप्त वस्तुओं के सरल प्रयोग
बता रही है जो जीवन के कुछ पहलुओ का उपाय भी साबित होगीं।
कमलगट्टा
यह धर्म और तंत्र प्रेमियों के लिए एक सुपरिचित वस्तु है। इसे पदम बीज के नाम
से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कमल से
हुई मानी जाती है। यही कारण है कि कमल को समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
कमलगट्टे से बनी माला का प्रयोग धन प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधनाओं में
मंत्र जप हेतु किया जाता है।
कमलगट्टे को देशी घी एवं सिंदूर के लेप में रंगकर उस पर चाँदी का वर्क लगाकर,
उसे पूजा घर में चाँदी की कटोरी या प्लेट में
रखना चाहिए तथा प्रतिदिन लक्ष्मी मंत्र का एक माला (108 बार) जप करना चाहिए।
मंत्र निम्नलिखित है-
ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं
कमलगट्टे को गल्ले में रखने से धनागमन प्रारम्भ हो जाता है। विशेष रूप से जहाँ
पर कि व्यवसाय बिल्कुल ठप हो गया हो अथवा कोई व्यक्ति नया कार्य प्रारम्भ कर रहा
हो ऐसी स्थिति में यह प्रयोग मनोवांछित फल देता है। व्यक्ति को आर्थिक कष्ट नहीं
घेरते।
दोमुखी रुद्राक्ष
पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवजी के आँसुओं से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई थी।
शिव को अतिप्रिय रुद्राक्ष का प्रयोग शिव पूजक माला जपने, धारण करने और रुद्राक्ष को ही शिव स्वरूप मानकर उसका पूजन
करने के लिए करते हैं अत: रुद्राक्ष को शिव मानकर पूजना युक्तिसंगत ही है।
रुद्राक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। मुख भेद के आधार पर उनका वर्गीकरण किया जाता
है। सभी रुद्राक्षों में दो मुखी रुद्राक्ष को विशेष महत्वपूर्ण मानने का कारण दो
मुखी रुद्राक्ष की पूजा शिवस्वरूप मानकर करता है। उसे भगवान शिव ही नहीं माता
पार्वती की कृपा भी सहज ही मिल जाती है।
महाशिवरात्रि या शुक्त पक्ष में सोमवार के दिन दो मुखी रुद्राक्ष लेकर उसे
गंगाजल से धोकर चांदी के पात्र में रखकर भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाना
चाहिए। उसके बाद रुद्राक्ष माता से अग्रलिखित मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। ‘ऊँ नम: शिवाय’
मंत्र जप के बाद अपनी मनोकामना भगवान शिव और माता पार्वती से कहनी चाहिए। ऐसा
कहने से व्यक्ति की कैसी भी जटिल कामना हो अवश्य पूर्ण होती है। रुद्राक्ष को घर
पर लाकर उसकी शिव स्वरूप मानकर नित्य पूजन करना चाहिए।
मारक दशा के प्रभाव में चल रहे व्यक्तियों को एवं जिन कन्याओंं के विवाह में
अनावश्यक विलम्ब एवं बाधाएं आ रही हों, उन्हें यह प्रयोग करना शुभ और कार्य सिद्धिदायक होता है और उनकी कामना पूरी
होती है।
लाल चंदन माला एवं ब्रासलेट
चन्दन एक सुविख्यात लकड़ी है। आस्थावान धार्मिक श्रद्धालुओं के लिए हमेशा से
ही चन्दन पूजन सामग्री के रूप में उपयोगी रहा है। चन्दन अपने अद्भुत गुणों के कारण
पूजा-पाठ के अतिरिक्त तंत्र-मंत्र-यंत्र के प्रयोगों और आयुर्वेद में भी उपयोगी
मानकर प्रयोग किया जाता रहा है। कबीर ने एक दोहे में सज्जन व्यक्ति की तुलना चन्दन
वृक्ष से करते हुए कहा है कि जैसे चन्दन के वृक्ष पर सर्प लिपटे रहने पर भी चन्दन
का वृक्ष सर्पों के जहर से बचा रहता है और अपनी सुगंध नहीं छोड़ता वैसे ही सज्जन
व्यक्ति कुसंगति में भी बुराईयों से बचा रहता है।
‘चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग’
लाल चंदन की 2 या 5 मणियों को धागे में पिरोकर अपने प्रेमी को
भेंट करना चाहिए।
‘ऊँ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा।’
ब्रासलेट को बांधते समय भी इस मंत्र का मन ही मन जप करना चाहिए।
इसके प्रभाव से दोनों के मध्य प्रेम गहरा हो जाता है। जिन व्यक्तियों के प्रेम
संबंधों को अन्य व्यक्ति समाप्त करना चाहते हों, उन्हें यह प्रयो शुभ रहता है। अपने प्रियजन के हाथ में
बांधने से उसका प्रेम और समर्पण भाव आपके प्रति अटूट बनेगा। लाल चंदन ब्रासलेट को
स्त्री वर्ग को बंधवाना चाहिए। केवल प्रेमिका ही नहीं, दो महिला मित्र भी एक-दूसरे के इसे बांध सकती हैं।
इसके अतिरिक्त लाल चंदन को साफ पत्थर, स्वच्छ जल के साथ घिसकर उसका तिलक लगाने से भी सामान्य वशीकरण का प्रभाव
उत्पन्न हो जाता है। किसी सभा में जाने से पूर्व यदि लाल चन्दन का तिलक किया जाए
तो उस सभा में व्यक्ति को प्रतिष्ठा मिलती है।
जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा हो उन्हें बाजार से कश्मीरी केसर लाकर
लाल चंदन के साथ साफ पत्थर पर गंगाजल में घिसकर स्नान आदि से पवित्र होकर माथे पर
बिन्दी लगानी चाहिए। यह प्रयोग 7 गुरुवार निरंतर
करना चाहिए। यह प्रयोग विवाह शीघ्र कराने में सहायक होता है।
जो व्यक्ति परिस्थितियोंवश अनैतिक व्यक्तियों के साथ रहते हों उन्हें लाल चंदन
की माला गले में धारण करनी चाहिए। इससे वह कुप्रभावों से बचे रहेंगे।
तुलसी ब्रासलेट एवं माला
तुलसी का पौधा अपने धार्मिक, सांस्कृतिक एवं
औषधीय गुणों के कारण सुविख्यात है। जिस घर में तुलसी का पौधा हो वहाँ का वातावरण
पवित्र रहता है, हर प्रकार की
बुराईयों से वह घर बचा रहता है। जो व्यक्ति तुलसी की मणियाँ धारण करता है उसके
अंदर पवित्रता का भाव प्रबल रहता है। बुराईयां एवं व्यसन उससे दूर रहते हैं। जो
स्त्री अपने प्रियजन के दाहिने हाथ में तुलसी मणियों का ब्रासलेट बाँधती है उसका
प्रियजन उससे पवित्र प्रेम करता है। वह उसका साथ कभी नहीं छोड़ता। दो मित्र भी इसे
एक-दूसरे के बाँध सकते हैं।
तुलसी की 5 या 7 मणियों के ब्रासलेट को कलाई पर बांधते समय
नीचे दिये गए मंत्र का मन ही मन जप करना चाहिए।
‘ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरूवे नम:’
जिन व्यक्तियों पर दायित्वों का भार हो, उन्हें भी तुलसी ब्रासलेट बांधना चाहिए। बुरे विचारों से
बचने के लिए कोई भी तुलसी ब्रासलेट को बांध सकता है।
तुलसी माला को गले में धारण करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व सरल, पवित्र और प्रभावशाली बन जाता है।
गुंजा
तंत्र जगत् की प्रभावशाली वनस्पतियों में गुंजा का नाम लिया जाता है। यह
सर्वत्र सरलता से सुलभ नहीं होती। सामान्यत: गुंजा के बीज लाल रंग के होते हैं।
अल्प मात्रा में सफेद और काली गुंजा भी प्राप्त होती है। काली गुंजा को दुर्लभ
माना जाता है।
परिवार में सभी लोगों के मध्य परस्पर प्रेम, सहयोग एवं समर्पण का भाव बना रहे इसके लिए घर के मुख्य
द्वार पर पांच अथवा सात गुंजाएं नए लाल वस्त्र में बांधकर शुक्ल पक्ष में रविवार
के दिन लटका देनी चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति से रुपया वापस लेना हो तो ऐसे व्यक्ति से भेंट करते समय अपने
पास लाल गुंजा के 5 एवं काली गुंजा
के 2 दाने जेब में रखने चाहिए
तथा बातचीत के दौरान किसी प्रकार उन्हें जेब इस प्रकार निकालें कि उस व्यक्ति की
दृष्टि उन पर पड़े। उसके बाद उन दानों को दूसरी जेब में रख लेना चाहिए। इससे शीघ्र
ही धन वापस मिलता है। धन प्राप्त होने के पश्चात गुंजा के दानों को किसी पवित्र
नदी में विसर्जित कर देना चाहिए।
वास्तु निर्माण तथा गृह प्रवेश के लिए शुभ मुहूर्त कैसे ज्ञात करें
हिंदू परिवारों में कोई भी शुभ काम करते समय मुहूर्त का विचार किया जाता
है। गृह निर्माण में भी चाहें नींव लगाने का समय हो, चाहे गृह प्रवेश का या
वास्तु पूजा हो, प्रत्येक कार्य में पंड़ितों से शुभ मुहूर्त पूछ कर
नवग्रह की पूजा की जाती है तथा उसके पश्चात ही घर का निर्माण कार्य अथवा
गृह प्रवेश का कार्य शुरु किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार गृह निर्माण
कार्य राशि तथा महीनों के अनुसार करवाना चाहिए।
गृह संस्थापनं चैत्रे दनहानिर्मदायर्य, वैशाखे शुभदं विदंयात ज्येष्ठेतु मरण् दृष्टम् आषाढ़े गोकुलम हति श्रावणे पुत्र वर्धनम्, प्रजारोगम् भाद्रपदे कुल होध्ययुजे तथा कार्तके धन लाभास्यान्मार्ण शीर्ष महाभयम्, पुष्ये चाग्निभयम् विद्यानमगेतु बहुपुत्र वान फाल्गुने रत्न लाभस्थन्मसनाम चा शुभा शुभम्।।
उक्त श्लोक के अनुसार किस माह में बनाए जाने वाले मकान का क्या फल होता है, यह निम्न प्रकार हैः
जब भी भवन बनाने के लिए नया भूखंड (जमीन) खरीदनी हो तो उस जमीन की भली-भांति परीक्षा कर लेनी चाहिए। इस परीक्षा से उस भूखंड का विस्तृत विवरण प्राप्त हो जाता है तथा उसकी प्रकृति का पता चल जाता है जिसके आधार पर यह निर्णय किया जाता है कि उस जमीन पर मकान बनाना शुभ रहेगा या अशुभ। इसके लिए शास्त्रों में कई प्रकार की परीक्षाएं बताई गई हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
गरुड़ पुराण में वर्ण के आधार पर भूमि के चार प्रकार बताए गए हैं। श्वेत वर्ण, पीत वर्ण, श्याम वर्ण एवं रक्त वर्ण। इनमें श्वेत वर्ण ब्राह्मणों के लिए, पीत वर्ण भूमि वैश्यों के लिए, रक्त वर्ण भूमि क्षत्रियों के लिए तथा श्याम वर्ण भूमि शूद्र वर्ग के लिए बताई जाती है। हालांकि वर्तमान में वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, ऐसे में इस नियम का उपयोग थोड़ा परिवर्तन कर दिया गया है। यथा श्वेत वर्ण की भूमि विद्या-अध्यापन से जुड़े कामों के लिए, पीत वर्ण भूमि व्यावसायिक (कॉमर्शियल) उपयोग के लिए, रक्त वर्ण भूमि शस्त्र विद्या सीखने सिखाने संबंधी कार्यों, तथा शूद्र वर्ण भूमि सेवा संबंधी कार्यों के लिए उपयोग लेनी चाहिए।
जीवन में सुख शांति व समृद्धि की प्राप्ति हेतु स्वयं का एक मकान का होना ग्रहस्थ आश्रम में बहुत ही आवश्यक प्रतीत होता है | जीवन के सही ढंग से निर्वाह की परिकल्पना के लिए वास्तु में शहर का चयन, शहर में भी सही भूमि का चयन और उसके बाद पिंड, आय, वार, नक्षत्र इत्यादि की गणना के द्वारा मकान बनाया जाना चहिये |
भारतीय भवन निर्माण कला स्वयं में कला, विज्ञान तथा आध्यात्म का एक ऐसा अभूतपूर्व तथा विलक्षण संगम है जिसके समकक्ष शिल्प कला विश्व के किसी भी भाग में नही पायी जाती | हमारे भवनों में जहां एक ओर रहने की सुविधाजनक व्यवस्थाओं का चिंतन किया गया है वहीं दूसरी ओर गृहस्थ जीवन पर ज्योतिष, तंत्र तथा दैवीय शक्तियों के प्रतीकात्मक तथा व्यावहारिक प्रभाव का लाभदायक प्रभाव प्राप्त करने के निमित्त वास्तु शास्त्र नामक एक पूरा विधान भी गढा गया तथा उसके अनुसार भवनों को ज्यादा उपयोगी तथा गृहस्थ जीवन को पूर्णता प्रदान करने में सहयोगी बनाने का भी प्रयास किया गया.
मकान बनाने के लिये किसी शहर या मुहल्ले के निर्धारण हेतु वास्तु सूत्र : गाँव या शहर के नाम के अक्षरों की संख्या को 4 से गुणा करने पर प्राप्त संख्या में अपने नाम के अक्षरों की संख्या जोड़ दें। अग्र लिखित कार्यवाही से प्राप्तांक संख्या में 7 का भाग दें।
नवीन भवन का निर्माण, पुराने की मरम्मत या वास्तुदोष का सुधार करना हो, वास्तुशास्त्र के इन पचास सूत्रो को हृदय संगम कर लेने से इस शास्त्र का पुरा लाभ उठाया जा सकता है। ये सूत्र आम जनता के लिये तो उपयोगी है ही, साथ ही सिविल इंजीनियर, आर्किटेक्ट, ठेकेदार, मिस्त्री और भवननिर्माण से जुडी कम्पनियो के अधिकारियो के लिए अत्यन्त उपयोगी है-
1 जिस जमीन मे दरारे हो, रेतीली हो, दीमक हो, पोली हो या जिसमे शल्य हो, उसमे मकान नही बनाना चाहिए।
2 जिस जमीन का घनत्व ठोस न हो या जो दलदली हो, उस पर मकान नही बनाना चाहिए।
3 जिस जमीन मे खेती, पेड-पौधे तेजी से बढते हो, जिसकी मिट्टी चिकनी हो, पानी बहुत नीचे न हो या पथरीली हो, वह भूमि मकान बनाने के लिये अच्छी होती है।
4 जिस जगह जाने पर मन मे प्रसन्नता हो और जो जगह देखने मे सुन्दर लगे, वहाँ मकान बनाना चाहिए।
5 भूखण्ड का आकर वर्गाकार, आयाताकार, भद्रासन एवं वृत्ताकार सभी प्रकार के भवनो का निर्माण करने के लिए शुभ होता है। गोमुखी भूखण्ड पर आवासीय भवन और सिंहमुखी भूखण्ड पर व्यावसायिक भवन बनाना शुभ होता है। इसके अलावा षडभुजाकार एवं अष्टभुजाकार भूखण्ड भी शुभ होता है।
6 त्रिभुजाकार, विषम बाहु, चक्राकार, सर्पाकार, अर्धवृत्ताकार, अण्डाकार, धनुषाकार, विजनाकार, कूर्मपृष्ठाकार, ताराकार, त्रिशुलाकार, पक्षीमुख एवं कुम्भाकार भूखण्ड अशुभ होते है।
7 त्रिभुजाकार आदि अशुभ भूखण्डो पर मकान बनाना अत्यावश्यक हो, तो उनके बीच मे चौकोर आकृति निकल कर सुधार करना चाहिये और बची जमीन पर दिशा के अनुसार पेड पौधे एवं घास लगानी चाहिए। इस सुधार के बाद वहाँ मकान बनाया जा सकता है। फिर भी ऐसा मकान मध्यम फलदायक होता हे।
8 विशाल भूखण्ड ऐश्वर्यदायक होता है किन्तु वह किसी तरफ से कटा-फटा नही होना चाहिए।
9 दो बडे भूखण्डो के बीच छोटा सा सकरा भूखण्ड अच्छा नही हेाता। उस पर आवासीय भवन नही बनाना चाहिए।
10 भूखण्ड की लम्बाई उत्तर दक्षिण की अपेक्षा पूर्व पश्चिम मे अधिक हो, तो शुभ होती है।
11 भूखण्ड का ढलान पूर्व एवं उत्तर की ओर होना अच्छा होता है, पश्चिम एवं दक्षिण की ओर नही।
12 भूखण्ड के बीच मे पश्चिम, नैऋत्य, आग्रेय, वायव्य एवं दक्षिण मे कुँआ, बोरिंग, भूमिगत टंकी, सैप्टिक टैक या किसी प्रकार का गड्ढा शुभ नही होता।
13 भूखण्ड पर आस-पास के भूखण्डो का पानी बहकर आना या भूखण्ड का आसपास के धरातल से नीचा होना शुभ नही होता।
14 भवन बनाते समय पश्चिम की अपेक्षा पूर्व मे और दक्षिण की अपेक्षा उत्तर मे अधिक खाली जगह छोडनी चाहिए।
15 भूखण्ड के पश्चिम एवं दक्षिण मे ऊँचे पेड, पहाडी, चट्टान, टीला एवं ऊँचे मकान शुभ होते है, पूर्व एवं उत्तर मे नही।
16 भूखण्उ के चारो ओर, उत्तर या पूर्व से सडक होना शुभ होता है। पश्चिम मे सडक होना, पूर्व एवं पश्चिम मे दोनो ओर सडक होना या उत्तर एवं दक्षिण मे दोनो ओर सडक होना मध्यम होता है।
17 आवासीय भूखण्ड के बिल्कुल पास मे श्मशान, कब्रिस्तान, मन्दिर, सिनेमा या सार्वजनिक स्थान होना अच्छा नही होता।
18 भवन का द्वार पूर्व या उत्तर मे रखना श्रेष्ठ है। पश्चिम मे द्वार सामान्य है। दक्षिण मे द्वार नही रखना चाहिए। द्वार के उपर द्वार नही बनाना चाहिए किन्तु ये नियम बहुमंजिले भवनो मे लागू नही होता।
19 पूजाघर के लिए ईशानकोण श्रेष्ठ है। यह पूर्व एवं उत्तर मे बनाया जा सकता है।
20 रसोईघर, भट्टी, बायलर आदि आग्रेय कोण मे श्रेष्ठ होते हैं। इनको आग्रेय के पास दक्षिण एवं पूर्व मे भी बनाया जा सकता है।
21 देवालय एवं धर्मस्थल मे द्वार चारो दिशाओ मे बनाये जा सकते है।
22 शयनकक्ष दक्षिण मे श्रेष्ठ होता है। यह ईशान, आग्रेय, पूर्व को छोडकर कही भी बनाया जा सकता है।
23 भारी वस्तुओ का स्टोर नैऋत्य मे और बिक्री के लिए तैयार माल या रोजमर्रा के काम की चीजों का स्टोर वायव्य मे बनाना अच्छा होता है।
24 अध्ययन कक्ष वायव्य, उत्तर एवं पूर्व मे बनाना चाहिए।
25 भोजनकक्ष पश्चिम मे बनाना श्रेष्ठ है। यह कक्ष आग्रेय एवं पूर्व के बीच, आग्रेय एवं दक्षिण के बीच वायव्य एवं उत्तर के बीच तथा मकान के बीच मे बह्म स्थान को छोडकर बनाया जा सकता है।
26 हवेली के बीच मे आँगन बनाना श्रेष्ठ है। इसका ढाल पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।
27 बेसमेन्ट आधे से कम भाग पर बनाना चाहिए। यह पूर्वी एवं उत्तरी भाग मे बनाना अच्छा होता है।
28 ड्राईग रूम या लिविग रूम आग्रेय एवं दक्षिण के बीच, दक्षिण, पश्चिम, वायव्य एवं पश्चिम के बीच, उत्तर एवं वायव्य के बीच मे बनाया जा सकता है।
29 आवासीय भवन मे दक्षिण एवं नैऋत्य के बीच, उत्तर एवं ईशान के बीच तथा पूर्व मे आँफिस बनाना चाहिए।
30 पोर्टिको ईशान, पूर्व, आग्रेय या उत्तर मे बनाना उपयुक्त होता है।
31 गोबर गैस प्लान्ट ईशान, पूर्व, आग्रेय या उत्तर मे बनाना श्रेष्ठ है।
32 शयन कक्ष मे सोते समय सिराहा दक्षिण या पश्चिम मे रखना चाहिए। उत्तर की ओर सिराहना सर्वथा वर्जित है।
33 शौचालय मे शौच के समय मुख उत्तर या दक्षिण की ओर होना चाहिए।
34 छत के ऊपर पानी की टंकीयाँ दक्षिण एव पश्चिम मे रखनी चाहिए। पूर्व, उत्तर या ईशान मे कदापि नही रखना चाहिए।
35 भवन की दीवारे दक्षिण एवं पश्चिम मे ऊँची तथा उत्तर एवं पूर्व मे नीची रखनी चाहिए।
36 सभी द्वार एवं खिडकियो की ऊँचाई समान सूत्र मे रखनी चाहिए।
37 कमरो मे अलमारी, सोफा, पलंग या स्थायी रूप से रखने वाला भारी समान दक्षिण नैऋत्य या पश्चिम मे रखना चाहिए।
38 सिंहमुखी भूखण्ड पर व्यावसायिक भवन का निर्माण शुभ होता है, गोमुखी पर नही।
39 व्यावसायिक भवन के लिए समीप मे मन्दिर, धर्मस्थल, सिनेमा, चौराहा एवं सार्वजनिक स्थान होना अच्छा होता है।
40 मन्दिर मे गर्भग्रह, प्रांगण, द्वार एवं शिखर का निर्माण वास्तु के अनुसार करना चाहिए।
41 भवन से जल एवं मल की निकासी वायव्य, उत्तर एवं पूर्व दिशा मे होनी चाहिए।
42 भवन मे अधिकतम तीन तरह की लकडी का इस्तेमाल कर सकते है। नये भवन मे पुरानी लकडी का इस्तेमाल नही करना चाहिए।
43 बने-बनाये भवन का विस्तार चारो दिशाओ मे करना या उत्तर एवं पूर्व की ओर करना श्रेष्ठ है।
44 भूखण्ड की मिट्टी पोली हो या शल्य दोष हो, तो उसकी मिट्टी खुदवाकर निकालकर नया मिट्टी का भरवाकर उस पर भवन बनाया जा सकता है।
45 भवन की आन्तरिक साज सज्जा मे युद्ध एवं दुर्घटना के चित्र, पत्थर एवं लकडी से बनी शेर, चीता, सूअर, सियार, सर्प, उल्लू, कबूतर, कौआ, बाज तथा बगुले की मूर्ति रखना शुभ नही माना जाता। देवताओ की मूर्ति पूजाघर मे पूजा एवं ध्यान के लिए रखना उचित है, सजावट के लिए नही।
46 भवन का शिलान्यास एवं गृहप्रवेश शुभ-मुहूर्त मे ही करना चाहिए।
47 पूराने घर की मरम्मत के बाद, वास्तुदोष के सुधार के बाद एव्र गृहप्रवेश के समय वास्तुशान्ति एवं अपने धर्मानुसार अनुष्ठान करना चाहिए।
48 पंचमहाभूतो के तालमेल के साथ निर्मित भवन का सन्तुलन एवं प्राकृतिक शक्तियो का प्रबंधन वास्तुशास्त्र कहलाता है।
49 यह शास्त्र वातावरण का विचार कर उसमे विद्यमान गुरूत्वशक्ति, चुम्बकीय एवं सौर ऊर्जा का उपयोग कर तन, मन एवं जीवन को स्वत: स्फूर्ति करने के नियमो का प्रतिपादन करता है।
50 वास्तुशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र मे अंग एवं अंगीभाव सम्बंध है। अत: वास्तुशास्त्र के साथ साथ ज्योतिषशास्त्र के माध्यम विचार करने पर जीवन की समस्या एवं संकटो के समाधान मे सरलता रहती है।