स्थापत्य वेद
चारों वेदों के उपवेद :
ऋग्वेद
का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्य वेद।
स्थापत्य वेद जो
अथर्ववेद का उपवेद हैं, कालान्तर में यह स्थापत्यवेद ही वास्तुशास्त्र के रूप में
विकसित हुआ। स्थापत्य वेद का उद्गम संस्कृत के ‘स्थापना’ शब्द से है, जिसका अर्थ स्थापना
करना है एवं वेद का तात्पर्य ज्ञान से है।
स्थापत्य वेद ऐसा ज्ञान है की व्यक्ति स्वयं को कैसे स्थापित करे जिससे व्यक्ति
दैनिक जीवन में सदैव प्राकृतिक विधानों के ऊर्ध्वगामी सिद्धांतों के अनुरूप जीवन
रखे। स्थापत्य वेद एक मात्रा विज्ञान है जिसके
पास स्थल चयन, उचित दिशा, विन्यास, स्थापन एवं कमरों
का उनके प्रयोजन के अनुसार नियोजन का सटीक ज्ञान एवं दीर्घकालीन परीक्षित सिद्धांत
है ।
इस प्रकार स्थापत्य वेद में प्राकृतिक विधानों के अनुरूप घरों एवं
कार्यालयों के अभिकल्पन के लिए उचित गणितीय फार्मूला, समीकरणों एवं
समानुपातों का वर्णन किया है। जिससे प्रकृति के सर्वाधिक मूलभूत नियमों का लाभ उठाया
जा सके और व्यक्ति पूर्ण स्वास्थ्य, प्रसन्नता, एवं समृद्धि को
प्राप्त करे।
आचार्य अनुपम जौली
